Chhattisgarh Sakti News: सक्ती। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत में हसौद का गढ़ उत्सव अपनी अलग पहचान रखता है। विजयदशमी के अवसर पर आयोजित होने वाला यह पारंपरिक उत्सव करीब 200 वर्षों से हसौद अंचल में धार्मिक आस्था और लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ है। रियासतकाल से चली आ रही इस परंपरा में दशहरा के दिन मिट्टी से बने गढ़ पर चढ़कर विजय हासिल करने की रस्म निभाई जाती है। हसौद के प्रसिद्ध साप्ताहिक बाजार के पास स्थित गढ़ इस आयोजन का प्रमुख केंद्र है। मिट्टी से निर्मित यह गढ़ एक विशाल टीले के स्वरूप में है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, गढ़ के नीचे पानी से भरा गड्ढा रहता है। विजयदशमी के दिन प्रतिभागी अपने साथियों के सहयोग से गढ़ पर चढ़ने का प्रयास करते हैं। खास बात यह है कि गढ़ पर चढ़ने के लिए डंडे या किसी अन्य सहारे का इस्तेमाल नहीं किया जाता। गढ़ पर चढ़ने की चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया में जो प्रतिभागी सबसे ऊपर पहुंचकर विजय हासिल करता है, उसे ‘गढ़ विजेता’ की उपाधि दी जाती है। आयोजन समिति की ओर से विजेता को सम्मानित कर पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है। इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए हसौद सहित आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण और दर्शक पहुंचते हैं। हसौद के गढ़-विजय समारोह में यादव समाज की विशेष भूमिका रहती है। स्थानीय परंपरा के अनुसार यादव समाज के लोग ही प्रतिभागी के रूप में इसमें शामिल होते हैं और निर्धारित पारंपरिक नियमों का पालन करते हुए गढ़ पर विजय हासिल करने का प्रयास करते हैं। पूरी प्रक्रिया साथियों के सहयोग से संपन्न की जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार हसौद का गढ़ करीब 200 वर्ष पुराना मिट्टी का टीला है। इसकी संरचना नीचे से चौड़ी और ऊपर की ओर क्रमशः संकरी होती जाती है। बताया जाता है कि गढ़ की ऊंचाई करीब 35 फीट तक है और ऊपरी हिस्से में इसकी चौड़ाई लगभग 5 फीट रह जाती है। गढ़ की इसी संरचना के कारण उस पर चढ़कर विजय हासिल करना प्रतिभागियों के लिए चुनौतीपूर्ण माना जाता है। गढ़ उत्सव के दौरान हसौद में विशाल मेला भी आयोजित होता है। यादव समाज की ओर से पारंपरिक राउत नाचा प्रस्तुत किया जाता है। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच गढ़-विजय समारोह का माहौल उत्सवी हो जाता है। आसपास के गांवों से आने वाले ग्रामीणों के लिए यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति और मनोरंजन का भी महत्वपूर्ण अवसर होता है। करीब दो शताब्दियों से चली आ रही इस परंपरा के संरक्षण और दस्तावेजीकरण की मांग स्थानीय स्तर पर उठती रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हसौद का गढ़ उत्सव छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और पारंपरिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संस्कृति विभाग की ओर से इस ऐतिहासिक आयोजन का दस्तावेजीकरण कर संरक्षण और संवर्धन की दिशा में पहल किए जाने से यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से पहुंच सकती है। शेयर करें Post navigation Sakti News: मां महामाया के दरबार में गूंजेंगे जसगीत, 19 को महानवमी और 20 अक्टूबर को होगा गढ़विजय आयोजन Raipur News: पेंशनर्स महासंघ ने उठाई कम्यूटेड पेंशन की बहाली अवधि कम करने की मांग, 11 साल बाद पूरी पेंशन बहाल करने की अपील