Chhattisgarh Dhamtari News: धमतरी। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में मोहन महारोलिया अपने समर्पण और जिम्मेदारी के लिए चर्चा में हैं। महज 18 साल की उम्र में पोस्टमार्टम का काम शुरू करने वाले मोहन को इस क्षेत्र में 25 साल पूरे हो चुके हैं। उनके मुताबिक, इस दौरान वे कुल 7,872 शवों का पोस्टमार्टम कर चुके हैं। अपने कठिन काम और अनुभव के कारण स्थानीय लोग उन्हें ‘पोस्टमार्टम किंग’ के नाम से जानते हैं।

मोहन के पिता धमतरी जिला अस्पताल में सफाईकर्मी के रूप में काम करते थे। मोहन बताते हैं कि जब वे 18 साल के थे, तब उनके पिता उन्हें पहली बार पोस्टमार्टम के लिए शव तैयार करने के उद्देश्य से मर्च्यूरी लेकर गए थे। शवों को पहली बार देखकर वे काफी डर गए थे। उनका कहना है कि पहली बार पोस्टमार्टम करने के बाद कई दिनों तक वे सामान्य रूप से खाना भी नहीं खा पाए, क्योंकि उस दृश्य की याद बार-बार उनके सामने आ जाती थी।

समय के साथ परिवार की जिम्मेदारी ने उन्हें इस काम में आगे बढ़ने का हौसला दिया। मोहन के अनुसार, एक समय उनके पिता का हाथ फ्रैक्चर हो गया और वे गंभीर रूप से बीमार भी पड़ गए। ऐसे में कम उम्र में ही उन्हें पिता की जिम्मेदारियां संभालनी पड़ीं। इसके बाद उन्होंने पोस्टमार्टम से जुड़े काम को जारी रखा और धीरे-धीरे इस कार्य में अनुभव हासिल किया।

पोस्टमार्टम का काम शारीरिक और मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण माना जाता है। कई बार अस्पताल में ऐसे शव भी लाए जाते हैं, जिनकी स्थिति बेहद खराब होती है। ऐसी परिस्थितियों में सावधानी और धैर्य के साथ काम करना जरूरी होता है। मोहन ने वर्षों तक इस जिम्मेदारी को निभाते हुए हजारों शवों के पोस्टमार्टम में सहयोग किया है।

मोहन के काम और निष्ठा की अस्पताल के डॉक्टर भी सराहना करते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें अब तक वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे खुद को हकदार मानते हैं, लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी संतुष्टि दुखी परिजनों की मदद करना है। समय पर पोस्टमार्टम के बाद जब शव परिजनों को सौंपा जाता है और वे हाथ जोड़कर धन्यवाद देते हैं, तो मोहन इसे ही अपने काम का सबसे बड़ा सम्मान मानते हैं।

मोहन महारोलिया की कहानी बताती है कि जिम्मेदारी, अनुभव और लगातार प्रयास से कठिन काम भी जीवन का अहम फर्ज बन सकता है। 25 वर्षों में 7,872 पोस्टमार्टम करने का उनका अनुभव धमतरी में उन्हें एक अलग पहचान दिलाता है।

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By admin